चिराग ने मां संग, नीतीश ने बेटे के साथ किया अर्घ्य; बिहार के 70 घाटों पर उमड़ी आस्था की बेमिसाल भीड़
पटना। पूर्वांचल की आस्था और लोक संस्कृति का महापर्व छठ मंगलवार की सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने के साथ संपन्न हुआ।
चार दिनों तक चले इस व्रत में आस्था, अनुशासन और शुद्धता की मिसाल देखने को मिली।
व्रतियों ने 36 घंटे के निर्जला उपवास के बाद नदी, तालाब और जलाशयों में खड़े होकर सूर्यदेव की उपासना की और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।
राजधानी पटना, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, भागलपुर, सारण, आरा समेत कई जिलों में लाखों श्रद्धालु घाटों पर उमड़ पड़े।
महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में सूप, फल, ठेकुआ और दीप लेकर अर्घ्य अर्पित किया।
हर घाट पर “छठ मइया की जय” और “उगी हे सूरज देव” के जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो उठा।
नेताओं ने भी दी आस्था की मिसाल
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान ने अपनी मां रीना पासवान के साथ छठ घाट पर सूर्यदेव को अर्घ्य दिया।
वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने बेटे निशांत कुमार संग उगते सूर्य को नमन किया।
दोनों नेताओं की उपस्थिति ने सामाजिक एकता और परंपरा के प्रति सम्मान का संदेश दिया।
घाटों तक पहुंचने में दिखी भीड़ और जाम
छठ की सुबह 4:30 बजे पटना के अटल पथ पर करीब एक किलोमीटर लंबा जाम लग गया।
पुलिस प्रशासन ने कड़ी मशक्कत के बाद ट्रैफिक को सामान्य किया।
जेपी सेतु घाट, दीघा घाट 83, दीघा घाट 88 और दीघा घाट 93 की ओर जाने वाले श्रद्धालुओं को थोड़ी असुविधा का सामना करना पड़ा।
फिर भी लोगों की श्रद्धा में कोई कमी नहीं आई।
70 घाटों से गूंजे छठ गीत और जयकारे
बिहार के 38 जिलों के 70 प्रमुख घाटों से छठ पूजा की झलकियाँ सामने आईं।
गंगा घाटों पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे।
प्रशासन, एनडीआरएफ और सफाईकर्मियों की टीमें पूरी रात डटी रहीं।
घाटों को फूलों, झालरों और दीयों से सजाया गया था।
व्रतियों ने सूर्यदेव को अर्घ्य देने के बाद व्रत का समापन किया और प्रसाद का वितरण किया गया।
पूरा बिहार छठ की भक्ति में डूबा रहा — यह सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि बिहार की पहचान बन चुका उत्सव है।
आस्था, अनुशासन और लोकपरंपरा का पर्व
छठ केवल पूजा नहीं, बल्कि संयम, श्रद्धा और स्वच्छता का प्रतीक है।
हर उम्र और वर्ग के लोग इसमें शामिल होकर एकजुटता का संदेश देते हैं।
उगते सूर्य को अर्घ्य के साथ यह महापर्व समाप्त तो हुआ, लेकिन इसके गीत और प्रकाश अब भी घाटों और गलियों में गूंज रहे हैं।



