Friday, March 6, 2026
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बिजनौर में बर्बरता की हद: शक में अंधा पति बना दरिंदा, पत्नी को गंजा कर जलाने की कोशिश

घरेलू हिंसा की भयावह तस्वीर, पुलिस कार्रवाई पर उठे सवाल

बिजनौर: उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले से सामने आया घरेलू हिंसा का यह मामला न केवल दिल दहला देने वाला है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे शक की आग में झुलसते रिश्ते, इंसानियत को भी शर्मसार कर देते हैं। एक पति ने अपनी पत्नी पर अवैध संबंधों का संदेह जताते हुए उसके साथ अत्याचार की सारी सीमाएं पार कर दीं — उसे उस्तरे से गंजा किया, बेरहमी से पीटा, और फिर पेट्रोल डालकर उसे जलाने की कोशिश की।

घटना का विवरण:

यह घटना बिजनौर जिले के नगीना देहात थाना क्षेत्र के एक गांव की है। पुलिस के अनुसार, आरोपी पति को शक था कि उसकी पत्नी के किसी से अवैध संबंध हैं। इसी शक के आधार पर उसने पहले उसकी निर्दयता से पिटाई की, फिर उस्तरे से सिर के बाल मुंडवा दिए, और इसके बाद उसे जलाने की नीयत से पेट्रोल डाल दिया।

गनीमत रही कि मौके पर मौजूद परिजनों ने समय रहते महिला को बचा लिया, वरना यह घटना एक हत्या की कहानी में बदल सकती थी।

FIR दर्ज, फिर खुद पीछे हटी पीड़िता:

घटना के अगले दिन, पीड़िता ने साहस जुटाकर थाने में तहरीर दी, जिसके आधार पर आरोपी पति को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। लेकिन हैरानी तब हुई, जब महिला ने अगले ही दिन पुलिस से आरोपी के खिलाफ कार्रवाई न करने की गुहार लगाई।

पुलिस ने फिर आरोपी के खिलाफ केवल शांति भंग की धारा में चालान किया और एसडीएम कोर्ट से उसे जमानत मिल गई।

कानूनी प्रक्रिया पर सवाल:

इस मामले में कई अहम सवाल खड़े होते हैं:

  • क्या ऐसे गंभीर और हिंसक मामले को केवल “शांति भंग” की श्रेणी में रखना न्यायसंगत है?
  • जब एक व्यक्ति अपनी पत्नी की जान लेने की कोशिश करता है, तो क्या वह महज ‘घरेलू विवाद’ कहा जा सकता है?
  • क्या पुलिस को ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान (Suo Moto) लेकर कठोर धाराओं में मुकदमा दर्ज नहीं करना चाहिए?

पीड़िता की चुप्पी के पीछे क्या है?

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाओं में पीड़िता की ओर से वापस कदम खींचना सामाजिक दबाव, आर्थिक निर्भरता, और बच्चों की सुरक्षा जैसी चिंताओं से जुड़ा होता है।

अक्सर महिलाएं समाज की “इज्जत” बचाने के नाम पर अपनी पीड़ा को निगल जाती हैं, और यही चुप्पी अपराधियों के हौसले बुलंद करती है।

समाज और सिस्टम के लिए चेतावनी:

बिजनौर की यह घटना हमें झकझोरती है और कहती है —घरेलू हिंसा निजी मामला नहीं, एक सामाजिक अपराध है।

यदि हम चुप हैं, तो हम भी दोषी हैं।

समाधान की ओर कुछ ठोस कदम:

  1. घरेलू हिंसा अधिनियम (2005) के तहत स्वतः कठोर कार्रवाई सुनिश्चित हो।
  2. पीड़ित महिलाओं को मुफ्त कानूनी सहायता, मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग और सुरक्षित शेल्टर होम मुहैया कराए जाएं।
  3. पुलिस को प्रशिक्षित किया जाए कि वह महिला की दबाव में दी गई बयानबाज़ी के पीछे की सच्चाई को समझे।
  4. समाज में घरेलू हिंसा के प्रति संवेदनशीलता और जागरूकता बढ़ाई जाए।

.निष्कर्ष:

बिजनौर की यह घटना कोई अकेली घटना नहीं है। यह उस अंधेरे और खामोश कोने की चीख़ है, जिसे अक्सर समाज “घर का मामला” कहकर नजरअंदाज कर देता है।

अगर अब भी हमने अपनी आंखें बंद रखीं, तो अगली बार ये आग किसी और के घर नहीं, हमारे घर में भी लग सकती है।

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