नई दिल्ली |एशिया कप 2025 का सबसे बहुप्रतीक्षित मुकाबला आज भारत और पाकिस्तान के बीच दुबई में खेला जाएगा। लेकिन इस हाई-वोल्टेज क्रिकेट मैच से पहले देशभर में भावनाओं का उबाल, राजनीतिक बयानबाज़ी और शहीदों की यादें बहस के केंद्र में हैं। यह मैच सिर्फ दो क्रिकेट टीमों के बीच नहीं, बल्कि देश के मन और अंतरात्मा के बीच टकराव बन गया है।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ और देश की टीस
यह मैच ऐसे समय में खेला जा रहा है, जब देश हाल ही में हुए दो बड़े आतंकी हमलों से उबरने की कोशिश कर रहा है — 22 अप्रैल को पहलगाम हमला और 7 मई को ‘ऑपरेशन सिंदूर’, जिनमें 26 भारतीयों की जान गई। इन घटनाओं ने न केवल देश की सुरक्षा व्यवस्था को झकझोरा, बल्कि जनता के भीतर गुस्से और पीड़ा की गहरी लहर पैदा की है।
.ओवैसी का तीखा वार: “क्या क्रिकेट पैसा शहीदों से कीमती है?”
AIMIM प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा:
“क्या भारत-पाकिस्तान मैच से कमाया गया पैसा उन 26 लोगों की जान से ज्यादा कीमती है, जिन्होंने देश के लिए अपनी जान दी?”
उन्होंने उत्तर प्रदेश और असम के मुख्यमंत्रियों से भी सवाल किया कि क्या उनके पास इतना भी अधिकार नहीं कि वे पाकिस्तान के खिलाफ खेलने से इनकार कर सकें।
.शिवसेना (UBT) का विरोध: सिंदूर भेजेंगी महिलाएं
शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट ने भी इस मैच का विरोध करने का ऐलान किया है।
पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा कि उनकी महिला कार्यकर्ता देशभर से सिंदूर इकट्ठा कर प्रधानमंत्री को भेजेंगी, ताकि सरकार को यह याद दिलाया जा सके कि जिन बेटों ने देश के लिए बलिदान दिया, उनकी माताओं की मांगें सूनी हो चुकी हैं।
“जब देश की माएं अपने लाल खो रही हैं, तब दुश्मन देश के साथ क्रिकेट खेलना क्या न्याय है?”, उद्धव ठाकरे ने कहा।
.केजरीवाल की अपील: “पब और क्लब में मैच मत दिखाइए”
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जनता से अपील की कि क्लब, रेस्टोरेंट और पब इस मैच का प्रसारण न करें।
“अगर ऐसा होता है तो हम विरोध प्रदर्शन करेंगे। यह देशभक्ति नहीं, देश के जख्मों पर नमक छिड़कना है,” केजरीवाल ने कहा।
.देश दो भावनाओं के बीच बंटा: खेल या शहादत की संवेदना?
भारत-पाकिस्तान का क्रिकेट मैच हमेशा से भावनाओं का खेल रहा है, लेकिन इस बार हालात अलग हैं।
एक तरफ देश की सैन्य और नागरिक शहादत की यादें ताजा हैं, दूसरी ओर खेल की भावना और अंतरराष्ट्रीय आयोजनों की मजबूरियां हैं। सवाल यह नहीं कि मैच होना चाहिए या नहीं — बल्कि यह है कि क्या “राष्ट्रीय सम्मान की कीमत पर अंतरराष्ट्रीय संबंध निभाए जा सकते हैं?”



