पहले चरण के नॉमिनेशन का आज आखिरी दिन, कांग्रेस-राजद की लिस्ट अब तक नहीं जारी
पटना | बिहार की राजनीति एक बार फिर चुनावी रंग में रंग चुकी है, लेकिन इस बार नज़ारा कुछ अलग है। एक ओर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने अपने 226 उम्मीदवारों के साथ चुनावी जंग का बिगुल बजा दिया है, वहीं महागठबंधन अब भी सीट शेयरिंग और टिकट बंटवारे की उलझनों में फंसा हुआ नजर आ रहा है।
राज्य की जनता जहां उम्मीदवारों के नाम और चेहरे जानने को बेताब है, वहीं राजद और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच सस्पेंस और असमंजस का माहौल है। इसका सीधा असर जमीनी स्तर पर चुनाव प्रचार और रणनीति पर पड़ता दिख रहा है।
NDA की चुनावी तैयारी: समय से पहले, रणनीति के तहत
NDA ने गुरुवार तक 226 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है।
- भारतीय जनता पार्टी (BJP) – 101 उम्मीदवार
- जनता दल यूनाइटेड (JDU) – 101 उम्मीदवार
- लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) – 14 उम्मीदवार
- हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) – 6 उम्मीदवार
- राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) – 4 उम्मीदवार
इस गठबंधन की रणनीति साफ है – समय रहते उम्मीदवार उतारो, प्रचार में बढ़त बनाओ। भाजपा और जेडीयू ने न सिर्फ टिकट वितरण में संतुलन दिखाया है, बल्कि क्षेत्रीय समीकरणों को भी साधने की कोशिश की है।
मैथिली ठाकुर को मिला टिकट, सांस्कृतिक कार्ड खेला
लोकप्रिय लोकगायिका मैथिली ठाकुर को अलीनगर सीट से जेडीयू का टिकट मिला है। यह न सिर्फ मिथिलांचल को साधने की रणनीति है, बल्कि युवा और सांस्कृतिक वोटरों को भी आकर्षित करने की कोशिश मानी जा रही है।
मुस्लिम प्रतिनिधित्व पर उठे सवाल
NDA की घोषित सूची में कुल 4 मुस्लिम उम्मीदवार हैं — वो भी सिर्फ जेडीयू की ओर से। भाजपा के 101 प्रत्याशियों में एक भी मुस्लिम चेहरा नहीं है। यह आंकड़ा कई सवाल खड़े करता है, खासकर अल्पसंख्यक वोट बैंक को लेकर।
वहीं, सूची में 49 सवर्ण उम्मीदवारों को जगह दी गई है, जिससे साफ होता है कि NDA ने जातीय संतुलन और परंपरागत वोट बैंक को मजबूत करने पर फोकस किया है।
महागठबंधन: अंदरखाने चल रही रस्साकशी
राजद और कांग्रेस के बीच सीटों को लेकर बातचीत अब भी पूरी नहीं हो पाई है। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस कम से कम 70 सीटों की मांग पर अड़ी है, जबकि राजद 50 से ज्यादा देने को तैयार नहीं है। इसके चलते न तो कोई संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई है, न ही किसी पार्टी ने आधिकारिक उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की है।
हालांकि दोनों पार्टियां अपने स्तर पर प्रत्याशियों को चुनाव चिह्न बांट रही हैं, लेकिन पारदर्शिता और रणनीति के अभाव में कार्यकर्ता भ्रमित हैं और विरोध के स्वर भी उभर रहे हैं।
चुनाव कार्यक्रम: वक्त बहुत कम, मैदान बड़ा
- पहले चरण का मतदान: 7 नवंबर
- दूसरे चरण का मतदान: 11 नवंबर
- मतगणना: 14 नवंबर
- नामांकन की अंतिम तिथि (पहला चरण): आज, 17 अक्टूबर
यानी जिन सीटों पर पहले चरण में मतदान होना है, वहां आज नामांकन का आखिरी दिन है, और ऐसे में महागठबंधन की देरी सीधा नुकसान पहुंचा सकती है।
कौन भारी, कौन हल्का?
एनडीए ने रणनीतिक रूप से अपनी तैयारियों को धरातल पर उतार दिया है। उम्मीदवारों की समय पर घोषणा, जातीय समीकरणों का ध्यान और स्टार चेहरे मैदान में उतारकर वह प्रचार की दौड़ में आगे निकल चुका है।
महागठबंधन की देरी उसे राजनीतिक, सामाजिक और प्रचारात्मक तीनों स्तरों पर पीछे कर सकती है। अगर जल्द स्पष्ट लिस्ट और एकजुट प्रचार नहीं होता, तो इसका फायदा सीधे-सीधे NDA को मिल सकता है।
बिहार की राजनीति में वक्त की कीमत बहुत बड़ी होती है। NDA ने जहां हर मिनट को रणनीतिक रूप से इस्तेमाल किया है, वहीं महागठबंधन हर दिन की देरी से खुद को कमजोर कर रहा है। आने वाले दिनों में जनता के बीच उम्मीदवारों की छवि और मुद्दे ही निर्णायक भूमिका निभाएंगे, लेकिन लड़ाई की शुरुआत में ही यदि एक पक्ष मैदान में न उतरे — तो हार का खतरा कहीं ज़्यादा हो जाता है।



