🇺🇸 ‘मेक इन अमेरिका’ का अगला चरण | 🇮🇳 भारत के लिए गंभीर कारोबारी चुनौती
वॉशिंगटन : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने वैश्विक व्यापार जगत में एक और बड़ा झटका देते हुए एलान किया है कि 1 अक्टूबर 2025 से अमेरिका में इम्पोर्ट होने वाली सभी ब्रांडेड और पेटेंटेड दवाओं पर 100% टैरिफ लगाया जाएगा।
इस फैसले के ज़रिए ट्रम्प प्रशासन विदेशी दवा कंपनियों को अमेरिका में निर्माण इकाइयां शुरू करने के लिए मजबूर करना चाहता है।
इस फैसले का सीधा असर भारत जैसे देशों पर पड़ेगा, जो अमेरिका को दवाओं का बड़ा निर्यात करते हैं। विशेष रूप से भारत, जो अमेरिका को हर 10 में से 4 दवाएं सप्लाई करता है, अब इस नीति के कारण एक कठिन आर्थिक मोड़ पर खड़ा हो सकता है।
दवा टैरिफ का अमेरिका और भारत पर असर
टैरिफ किन पर लगेगा?
- ब्रांडेड / पेटेंटेड दवाएं जो अमेरिका के बाहर बनी हैं।
- असरदार उन कंपनियों पर जो अब तक अमेरिका में निर्माण नहीं कर रहीं।
किन पर टैरिफ नहीं लगेगा?
- वे कंपनियां जो अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स स्थापित कर रही हैं या निर्माण शुरू कर चुकी हैं।
भारत की फार्मा इंडस्ट्री के लिए तगड़ा झटका
- भारत अमेरिका को हर साल $8.73 अरब (₹77,000 करोड़) की दवाएं एक्सपोर्ट करता है।
- यह भारत के कुल दवा निर्यात का लगभग 31% हिस्सा है।
- प्रमुख कंपनियां जैसे डॉ. रेड्डीज, सन फार्मा, ल्यूपिन न केवल जेनेरिक, बल्कि कुछ ब्रांडेड दवाएं भी अमेरिका भेजती हैं — अब वे टैरिफ के दायरे में आएंगी।
ट्रम्प का तर्क: सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और अर्थव्यवस्था
“हम दवाओं के लिए विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भर नहीं रह सकते। महामारी ने हमें सिखाया कि अगर सप्लाई टूटे, तो पूरा सिस्टम चरमरा सकता है।”
— डोनाल्ड ट्रम्प
- ट्रम्प प्रशासन के अनुसार, यह टैरिफ अमेरिका की फार्मा सप्लाई चेन को सुरक्षित करने और देश में मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहन देने के लिए जरूरी है।
- यह कदम उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ और ‘मेक इन अमेरिका’ नीति के तहत लिया गया है।
जेनेरिक दवाओं को क्यों मिली छूट?
कारण:
- जेनेरिक दवाएं ब्रांडेड की तुलना में 80-90% तक सस्ती होती हैं।
- अमेरिका का हेल्थकेयर सिस्टम इन पर अत्यधिक निर्भर है।
- यदि इन पर टैरिफ लगाया जाता, तो दवाओं की कीमतें आसमान छू जातीं।
ट्रम्प प्रशासन ने स्पष्ट किया कि जेनेरिक दवाओं पर फिलहाल कोई टैरिफ नहीं लगेगा, ताकि अमेरिकी नागरिकों पर आर्थिक भार न बढ़े।
ब्रांडेड vs जेनेरिक दवाएं: फर्क क्या है?
| विशेषता | ब्रांडेड दवाएं | जेनेरिक दवाएं |
|---|---|---|
| रिसर्च आधारित | हां | नहीं |
| पेटेंट | होता है (20 साल) | नहीं होता |
| कीमत | बहुत ज्यादा | 80-90% कम |
| एक्सक्लूसिविटी | केवल आविष्कारक कंपनी बना सकती है | कोई भी बना सकता है (पेटेंट खत्म होने के बाद) |
अन्य भारतीय प्रोडक्ट्स पर भी टैरिफ की मार
| उत्पाद | नया टैरिफ | लागू तिथि |
|---|---|---|
| कपड़े, गहने, सी-फूड, फर्नीचर | 50% | 27 अगस्त 2025 |
| किचन कैबिनेट और बाथरूम वैनिटी | 50% | 1 अक्टूबर 2025 |
| अपहोल्स्टर्ड फर्नीचर | 30% | 1 अक्टूबर 2025 |
| भारी ट्रक (विदेशी) | 25% | 1 अक्टूबर 2025 |
ट्रम्प का आरोप: “ये सस्ते विदेशी प्रोडक्ट्स हमारे बाजार को भर रहे हैं। यह हमारी मैन्युफैक्चरिंग के लिए खतरा है।”
भारत के लिए रणनीतिक विकल्प क्या हैं?
- अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट स्थापित करें, ताकि ब्रांडेड दवाओं को टैरिफ से छूट मिल सके।
- जेनेरिक दवाओं पर फोकस बनाए रखें, जिनकी मांग और लाभप्रदता स्थिर है।
- नई ग्लोबल मार्केट्स की तलाश करें, ताकि अमेरिका पर निर्भरता कम हो।
- कूटनीतिक वार्ताओं के जरिए टैरिफ में राहत की संभावनाएं टटोली जाएं।
यह सिर्फ टैरिफ नहीं, रणनीतिक दबाव है
ट्रम्प का यह फैसला केवल एक व्यापारिक निर्णय नहीं, बल्कि रणनीतिक दबाव का हथियार है। इसके ज़रिए वे न सिर्फ विदेशी कंपनियों को अमेरिका लाना चाहते हैं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को भू-राजनीतिक संतुलन के मुताबिक पुनर्गठित करना चाहते हैं।
भारत के लिए यह एक सतर्कता का समय है — जहां अवसर भी है और चुनौती भी। अगर सही रणनीति अपनाई जाए, तो भारत इस दबाव को दीर्घकालिक अवसर में बदल सकता है।



